Sunday, October 08, 2017

એક સરોવર ની વાત

સરોવરનું શાંત સ્થિર જળ...જાણે દર્પણ
સાફ સ્પષ્ટ દેખાતું એમાં
પ્રતિબિંબ આકાશ નું
હર પ્રહર રહેતું બદલાતું, રંગ માં,
કદી ઘેર્યું તો કદી નિરભ્ર
પ્રતિબિંબ જ...છાપ તો કદી ના છોડતું
બસ વાયુ ની લહેર માં કદી જરા ધ્રુજતું

એ જળને સૂર્યકિરણો ચમકાવી રહ્યા
જેમ રત્નો અણમોલ હો ત્યાં ભર્યાં
નિરવ છે વાતાવરણ
બસ થોડા ભ્રમર કમળે ગૂંજી રહ્યા

ત્યાંજ આવ્યું કોઈ ફરતાં ફરતાં
એ જ નિશબ્દતાને કાજ
હતા કે એના કાન તરસતાં?

ના...નહોતી આદત કદાચ એને
જળ વાયુ આભથી એક થઈ ને...
બસ એક થઈ ને,
થોડી ક્ષણો વિતાવવાની

શું કર્યું? ઉઠાવ્યો એક પથ્થર કાંઠે થી.
શું જાણવું'તુ? કેટલે દૂર જાશે એના હાથ થી?
કોણ જાણે...બસ ઉઠાવ્યો,
એ ને તાણી ફેંક્યો પાણી માં...

...છપાક...

પડ્યો તે સરોવર માં...

પાણી ઉડયું થોડું.
ઉડતાં જલબિન્દુએ ઝીલ્યાં કિરણો,
સોનેરી એ પણ ચમક્યા જરા,
ને ફરી મળી ગયા તળાવ માં.
માછલીઓ ચોંકી, તરી દૂર ગઈ,
પંખી એક અવાજ માં ચહેકી ઉડયા.

હા...એક વાત થઈ...જોયું?
એ પથ્થર પણ તો પલળ્યો,
જઈ પડ્યો જ્યારે જળ માં...
બસ જરાતરા ભીનો ન થયો,
સમાઈ ગયો એ પૂરો તળમાં.

હવે તો પાણી ની માછલીઓ
રમશે આસપાસ તરતી,
બનાવશે ઘર
એ જ પથ્થર પાછળ,
જે બની રહ્યું
અંગ નાનકડું
એ સરોવર નું,
જેમાં પડ્યો હતો એ પથ્થર...
બનાવતો વલયો
એકદા...છપાક થી.

- BhairaviParag

(One of my earlier poem in Hindi - वलय - posted elsewhere on this blog, presented again in Gujarati here)

Wednesday, September 20, 2017

Raindrops!

बारिश की बूंदें...कितनीं?


कुछ ठहरें गुलाब की दो पँखुड़िओं पर
चमकें हीरों सी नई किरणों में
महकते पलों को मन के कोनों से
फिर से जगा दें उतनीं

दो हाथ फैलाए खिड़की से
भीग जाएँ फिर थामे अंजलि में
वो भर भर जाएँ, छलके फिर
बहें मिलने धरती से उतनीं

चलते राहों पर गहराये
बादलों से गरज कर बरस पड़े
कोरा न रहे तन और मन को भी
भीगा कर हरा दें उतनीं

झरने लगें बहने कल कल कल
भर जाएँ ताल एक हो जल थल
आकाश भी मिल जाए धरती को जब
क्षितिज को धुंधला दें उतनीं

बारिश की बूंदें...उतनीं 
Raindrops...Hands-full of them
 -BhairaviParag

Thursday, February 16, 2017

Beauty is...


 Beauty is...


To love without attachment

To embrace without possessiveness

To wait without expectation

To cry without bitterness

To remember without regret

To strive without feverishness

To create without pride 

To sing without congregation

To dance without inhibition
To travel without itinerary

To laugh without ridicule

To smile without reason

To listen without preoccupation

To earn without greed

To learn without limit

To explore without fear

To succeed without manipulation

To play without competition

To excel without artifice

To give without calculation

To receive without paucity

To praise without jealousy

To apologise without guilt

To forgive without conditions

To belong without restriction


To be, without pretensions,

To dissolve, without trace.

  

Beauty is ... to live fully. Naturally.

For That's what You Are. Beautiful.



Saturday, November 12, 2016

शुभ लाभ and Demonetization

The demonetization move came just 10days after लक्ष्मी-पूजन, which I considered poetic justice. You'll see why.


Here are some old fashioned views that I hold about money:

  • Genuinely earned money is never lost.
  • There are no shortcuts to value creation.
When you have income because of the real value you added, by providing quality goods and services, only that is शुभ लाभ, which we aim at when we perform लक्ष्मी पूजा। Rest all, even legal means to generate income, like derivatives etc, are not लक्ष्मी but only वित्त। Enjoy, but Never count on such means to last. It would go away in फ़िज़ूलखर्ची in overpriced restaurants or "luxury goods" low in substance or ego boosters like show-off in weddings or in litigation or avoidable health problems.

Plus, just as energy is never destroyed, value too isn't. Some paper currency which will be trashed following the demonetization is just representative of value, for व्यवहार...Not intrinsically valuable like land or gold or foodgrains is, but because it's backed by gold reserves. Shift that backing to new notes from old...Poof go the old ones for those who never actually deserved, on the energy-level. (Yeah, illogical, but then, logic ke haath itne lambe nahi hote ki Truth tak pahunche) ☺

So those professionals & business houses which hold cash to save some tax will just lose out on that much amount which they would have anyways paid to the Government in past years. So don't fret even if you have lost some money in this demonetization. What's deservedly yours will multiply & come back to you soon. As tax is based in constitution, & if that tax would've been used for welfare of our nation, the Government deserves it, now got paid by you, a ऋण fulfilled. If you know you had actually worked for that money which you happen to lose, because of that 200% penalty etc, know that you will earn double in just a short time to come. No one but you will know. And smile.

Yeah, some might laugh and call me naïve. Or not fit to live in 'todays India' as some person actually said few years ago. But this is what I am, and happily so.
But then, YOU KNOW. 

So, such are my principles of handling money -

  • Never play with money. Not by playing cards, not in speculative markets...and then I do not know which other ways.
  • धन-शुद्धि by contributing to good causes - whether धार्मिक or social.
  • Count on only deservedly earned money as yours. Not the money which I have gained by even legal means like stock prices or what is inherited. For such gains, i just consider fortunate and feel grateful to the circumstances that led me to the gains.
  • As a corollary, when you add value in any area but do not charge for it, the value comes back to you in some form or the other. It brings 'luck' and prosperity.

That's it. Thanks so much for reading. :)

Monday, August 15, 2016

हे ध्वज! अजर अमर रहना

  


राष्ट्रिय शायर कहलाते ज़वेरचंद मेघाणी (1896-1947) की रचनाओं के बिना गुजराती लोकसंस्कृति का अभ्यास अधूरा है। उनकी रग रग में सौराष्ट्र की मिट्टी की सौंधी सुगंध बसी हुई थी। ग्रामीण जीवन का ऐसा चित्रण उनकी अनगिनत कविताओं, नवलकथा और लघुवार्ताओं में और लोकसाहित्य के उनके द्वारा किये गए संग्रह और विवेचन में पाया जाता है, की वे गुजरात का सांस्कृतिक इतिहास जानने में एक अनिवार्य अंग हैं। जनसेवा और स्वतन्त्रता संग्राम में भी उन्होंने अमूल्य योगदान दिया। 

प्रस्तुत अनुवादित रचना में हमें उनकी ऊर्जावान वाणी की एक ज़लक मिलती है, जिसमें उस युग के जनमनोभाव को शब्दों में व्यक्त किया गया है।

विदेशी हाथों से छुड़ाकर मातृभूमि का गौरव फिर पाने भारत के हज़ारों सपूत न्योछावर हो गए, उन्हें बल दिया एक सादगी भरे तिरंगे ने, जिसमे न थी कोई रजवाड़े की भभक, न ही सेनाबल की हुंकार थी। था तो बस धैर्य और स्नेह, जिसके बल हर वो माँ, हर वो पत्नी ने अपने सर्वस्व को देश के नाम कर दिया। उसे लहराता देखने की मोहनी ऐसी लगी, अन्य भक्ति को परे कर शीश धरने का उत्साह कोटि कोटि हृदयों में उत्पन्न हुआ। इसी ध्वज से कवि प्रेममय बिनती करते हैं, हर बलिदान का साक्षी, स्वराज्य का वह संतरी उन्हें शक्ति देता रहे। 

आज स्वराज्य के सत्तरवें वर्ष में स्वतंत्र राष्ट्र के गौरवशाली ध्वज का वंदन करते समय उसी तिरंगे के पूर्वानुगामी चरखे वाले तिरंगे ध्वज के दीवानों का स्मरण करना समयोचित है, जिनके हम कृतज्ञ हैं। आशा है मूल गुजराती काव्य का भाषांतर करने का यह विनम्र प्रयास उन भावनाओं को आप तक पहुँचा पायेगा।



ध्वज वन्दन

तेरे कितने ही प्यारोंने अमोल रक्त बहाया
पुत्रवियोगी माताओंने नयन से नीर बहाया
हे ध्वज! अजर अमर रहना
बढ़ आकाश में छाये रहना

तेरे मस्तक नहीं लिखित है गरुड़ सी मगरूरी
तेरे पर नहीं अंकित कहीं समशेर-खंजर-छुरी
हे ध्वज! दीन विहग सा
तुज उर पर चरखा प्यारा

अखिल जगत पर गूंजती नहीं त्रिशूलवती जलरानी
महाराज्य का मद प्रबोधती नहीं तुज गर्व निशानी
हे ध्वज! धीर और संतोषी
ह्रदय तेरे माँ वृद्धा बसती

नहीं किनखाब मखमल रेशम की पताका तेरी
नहीं रंगों भरी चमकदमक या सुवर्णतार की ज़री
हे ध्वज! सादगी खादी की लिए
मन कोटि कोटि तूने मोहे

परभक्षी भूदल-नौदल का नहीं तेरा कोई हुँकार
वनवासी मृग पर भय फैलाता न करे कोई शिकार
हे ध्वज! उड़ना लहराता
स्नेह समीर से सहलाता

सप्त सिंधु की अंजलि लिए समीर तुज पर फहराए
नवखंड के आशिष लिए सागर लहरें टकराएँ
हे ध्वज! जग यह थका हारा
तू एक आशा दीप है प्यारा

नील गगन से हाथ बढ़ाकर विश्वनिमंत्रण देता
पीड़ितजन से बंधूभाव का शुभसंदेश कहेता
हे ध्वज! बुलाना जग को
सारी प्रजा के लगें मेले

नील गगन से रंग पी बना उन्नत हरित तुज नैन
अरुण के केसरिया रंग अंजन कर दूजा जागेगा रैन
हे ध्वज! शशि ने है तीजा सींचा
धवल त्रिलोचन तेरा साचा

तीन नेत्रों भर तूने निहारे तुज गौरव के रखवाले
श्रीफल जैसे टकरा फूटे कई शीश ऐसे मतवाले
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
मूक त्याग हमें रहा सहना

कोमल बाल किशोर युवा वृद्ध तेरे काज बढे आये
नर नारी निर्धन या धनी सब भेद हैं भुलाये
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
रहा रुधिर की धार को बहना

कोई माता की खाली कोख का आज बना तू बेटा
भाल के कुमकुम मिटे जिनके, उनको तू ही बल देता
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
सहस्त्र समर्पित का कहना

तुझको गोद ले सो रहे देखे बालक प्यारे
तेरे गीत की मस्ती में भूख प्यास बिसारे
हे ध्वज! मोहनी तेरी कैसी लगी
फ़िदा हुए तुझ पर कई जोगी

अब तक की होगी हमने अन्य की भी भक्ति
रक्तपिपासु राजाओं के तले लगाई शक्ति
हे ध्वज! नमकहलाली की
थी वह रीत गरज पुरानी

पंथ पंथ कईं की पूजा की, हरेक की ध्वजा निराली
उस पूजन पर शीश गँवाए : हाय कथा वह काली
हे ध्वज! अब वह युग है बीता
अब सकल वंदन के तुम देवता

तुम सच्चे अम कल्पतरुवर, मुक्तिफल तुज पर प्यारे
तेरी शीत सुगंध यहीं, न किसी और स्वर्ग के किनारे
हे ध्वज! युग युग तुम खिलना
सुगंध धरा पर पसारे रखना

राष्ट्रदेव के मंदिर कलश पर गहरे नाद तू लहराये
सर्वधर्म के उस रक्षक को संत सिपाही नम जाए
हे ध्वज! आज जो न भी माने
कल तुज रज शीश धरेंगे हम मानें

अष्ट प्रहर हुँकार देता जागृत उत्साही रहना
सावध रहना, पहरा देना, निद्रा न हमें आने देना
हे ध्वज! स्वराज्य के तुम रक्षक
रहे विजय ध्वनि तेरा अखंड सतत

मूल - ज़वेरचंद मेघाणी
गुजराती से हिंदी अनुवाद - भैरवी पराग आशर

Monday, May 16, 2016

सूरज कहीं नहीं जाता


People change, Situations change, Opinions change. But there's something that does not change...ever. Unshakeable, unperturbed, untouched by impermanence. Call it Knowledge, Love, or Divine...If you have ever truly known it, it is yours forever...You never lose THAT!

सूरज कहीं नहीं जाता

घिरें बादल भले, वर्षा भी तो है उसी का उपहार
जानते हम वह रहा चमकता घन के उस पार
धरती की तृषा बुझे जैसे ही 
प्रकाश से फिर नहलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

भले ही मुँह फेर ले धरती उससे रात अँधेरे में
क्षितिज के पार ठहरा मूर्त धैर्य सा हम जब घूमें फेरे में
तम से ज्योति की ओर दृष्टि हो जैसे ही 
नए दिन को फिर फैलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

जो भी है अमूल्य आलोकित जीवन में तुमने पाया 
भले छूट जाए कुछ क्षण कुछ दिन जब हो मन भरमाया 
अगर जाना है उसे मन से, भले ही अब है नकारा
जानो अनन्त समय तक हर पल वो है तुम्हारा 

भीड़भाड़ में हाथ से छूट कभी 
कंकड़ सा ठोकर भी खाता
धूल की परतें हट जाएँ 
रत्न फिर हाथ आ जाता
 
...सूरज कहीं नहीं जाता

- BhairaviParag

Quote of the moment:
"...Once you blossom then you never wither. If you move ten steps ahead, you may go back eight steps but you can never go back all ten steps..." ...(Full text here)
-Sri Sri Ravi Shankar

Wednesday, April 27, 2016

वलय

Situations do not leave a mark on a mind that is one with the vast creation, just as no images lie permanent on a mirror. Disturbances, if any, only last for a few moments, like ripples in water...and as time flies, they only add to the richness of understanding of life.

शांत जल एक सरोवर में
उस में साफ़ स्पष्ट
दिख रहा
प्रतिबिम्ब आकाश का 
हर प्रहर बदलता, बिना छाप छोड़े
हवा से ज़रा सा कभी कभी कांपते 
उस पानी को सूर्य की किरणें चमका रहीं 
जैसे रत्न झिलमिलाते रहते

नीरव है वातावरण
बस कुछ पंछी ही उड़ रहे
 
तभी कोई आया टहलता 
उसी निःशब्दता की तलाश में

शायद आदत नहीं थी उसे
जल से आकाश से एक हो कर 
बस एक हो कर कुछ देर बैठने की
उठाया एक
पत्थर किनारे से
क्या देखना था...कितनी दूर जाता है?
पता नहीं...बस उठाया
तानकर फैका पानी में

...छपाक... 
जा गिरा सरोवर में
पानी उड़ा थोडा
उड़ती बूँदें भी ज़रा सी चमकीं धुप में
फिर मिल गयीं ताल में
मछलियाँ चौंकीं, तैर दूर गयीं
पक्षी भी उड़े एक आवाज़ दे कर
जल में कुछ वलय बने
फ़ैल कर कुछ बड़े बन
फिर मिल गए समतल में
झिलमिलाते आसमानी दर्पण के 
 
हाँ, एक बात तो है
वह पत्थर भी तो गीला हो गया
जब गिरा जल में
बस गीला ही नहीं
डूब गया है पूरा ही
पानी में, बैठ गया तल में

अब पानी की मछलियाँ
खेलेंगी आसपास, तैरती हुईं
बनाएँगी घर उसी पत्थर के पीछे
इस तालाब का छोटा सा
एक हिस्सा ही बन गया
वह पत्थर जो गिरा
एक बार....छपाक से
 
-BhairaviParag